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डॉ. नीरज अग्रवाल: एक कर्मयोगी चिकित्सक, जिनका जीवन भगवद गीता से प्रेरित है

Dr. Neeraj Agarwal performing orthopedic surgery


भारत की धरती पर चिकित्सा को हमेशा से एक पवित्र सेवा के रूप में देखा गया है। डॉक्टर को भगवान के दूत के समान माना जाता है, क्योंकि वे लोगों को नई ज़िंदगी देने का काम करते हैं। राजस्थान के जाने-माने ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. नीरज अग्रवाल इस परिभाषा को पूरी तरह चरितार्थ करते हैं।


उन्होंने अब तक 10,000 से अधिक घुटनों के ऑपरेशन और 1,500 से अधिक कूल्हे के ऑपरेशन सफलता पूर्वक किए हैं। वे जयपुर के प्रतिष्ठित जीवन रेखा अस्पताल के निदेशक हैं और अपने कौशल के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। लेकिन जो बात उन्हें सबसे अलग बनाती है, वह है उनका भगवद गीता के सिद्धांतों को अपने जीवन और चिकित्सा सेवा में अपनाना।


वे गीता को सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने और अपने कर्तव्य को निभाने की कला मानते हैं। उनका मानना है कि चिकित्सा सेवा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक धर्म और कर्मयोग का मार्ग है। वे अपने हर ऑपरेशन और मरीज के इलाज को भगवान की सेवा मानते हैं और हर कार्य को पूरे समर्पण व निष्ठा के साथ करते हैं।


भगवद गीता और डॉ. नीरज अग्रवाल का चिकित्सा दर्शन

1. कर्मण्येवाधिकारस्ते – कर्म ही हमारा धर्म है

भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"

(अर्थात: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता मत करो।)


डॉ. नीरज अग्रवाल इस सिद्धांत पर पूरी तरह विश्वास रखते हैं। एक सर्जन होने के नाते, वे हर ऑपरेशन को पूरी मेहनत, ईमानदारी और समर्पण के साथ करते हैं, लेकिन वे परिणाम की चिंता नहीं करते। उनका मानना है कि यदि हम अपने कार्य को पूरी निष्ठा से करें, तो परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा।


वे हमेशा अपने मरीजों को सर्वोत्तम इलाज देने का प्रयास करते हैं और उन्हें सही मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, लेकिन वे इस बात को भी स्वीकारते हैं कि अंतिम निर्णय प्रकृति और भगवान के हाथ में होता है। यह दृष्टिकोण उन्हें मानसिक रूप से शांत और संतुलित बनाए रखता है, जिससे वे कठिन परिस्थितियों में भी अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाते हैं।


2. समत्व योग – सफलता और असफलता में समान भाव

भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है:

"सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।"

(अर्थात: सफलता और असफलता दोनों में समान भाव रखना ही योग है।)


एक डॉक्टर के जीवन में हर दिन नई चुनौतियाँ आती हैं। कभी ऑपरेशन पूरी तरह सफल होता है, तो कभी कुछ अप्रत्याशित परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। डॉ. नीरज अग्रवाल हर परिस्थिति को शांत और संतुलित मन से स्वीकार करते हैं।


वे न तो सफलता पर अहंकार करते हैं और न ही किसी असफलता से हताश होते हैं। उनका मानना है कि हर अनुभव से कुछ सीखने को मिलता है, और यही सोच उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।


3. निष्काम सेवा – मरीजों की सेवा ही सच्ची पूजा

गीता में कहा गया है:

"यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।"

(अर्थात: जो कार्य यज्ञ या सेवा भाव से नहीं किया जाता, वह बंधन का कारण बनता है।)


डॉ. नीरज अग्रवाल चिकित्सा को एक सेवा और यज्ञ मानते हैं। उनका मानना है कि मरीजों की सेवा करना ही उनका सबसे बड़ा धर्म है। वे हमेशा अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग मरीजों की भलाई के लिए करने में विश्वास रखते हैं।


उनका यह मानना है कि डॉक्टर का कर्तव्य केवल दवा देना या ऑपरेशन करना नहीं, बल्कि मरीज को मानसिक और भावनात्मक रूप से भी मजबूत बनाना है। वे अपने मरीजों को स्वस्थ होने की सकारात्मक ऊर्जा देते हैं और उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे आत्मविश्वास बनाए रखें।


4. अहंकार का त्याग – सफलता को भगवान का आशीर्वाद मानना

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

"मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।"

(अर्थात: अपने सभी कार्यों को ईश्वर को समर्पित कर दो।)


डॉ. नीरज अग्रवाल इस बात पर गहरा विश्वास रखते हैं कि उनकी चिकित्सा क्षमता और सफलता केवल उनके अपने प्रयासों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह भगवान का आशीर्वाद है।


वे हमेशा नम्र रहते हैं और अपने कार्य को ईश्वर की कृपा मानते हैं। वे यह मानते हैं कि डॉक्टर केवल एक माध्यम हैं, असली इलाज करने वाला तो ईश्वर ही है। यही सोच उन्हें अहंकार से मुक्त रखती है और हमेशा सेवा भाव से प्रेरित करती है।


नए डॉक्टरों के लिए प्रेरणा

डॉ. नीरज अग्रवाल केवल एक सर्जन ही नहीं, बल्कि एक शिक्षक और मार्गदर्शक भी हैं। वे हमेशा युवा डॉक्टरों को सिखाते हैं कि चिकित्सा एक सेवा है, जिसे पूरी ईमानदारी, करुणा और निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए।


उनका मानना है कि एक डॉक्टर को हमेशा मरीज के प्रति संवेदनशील और दयालु होना चाहिए। तकनीक और विज्ञान जितना भी आगे बढ़ जाए, लेकिन जब तक डॉक्टर के अंदर सेवा भाव और मानवता नहीं होगी, तब तक वह एक सच्चा चिकित्सक नहीं बन सकता।


 डॉ. नीरज अग्रवाल – आधुनिक युग के एक सच्चे कर्मयोगी

डॉ. नीरज अग्रवाल न केवल एक बेहतरीन ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं, बल्कि भगवद गीता के सच्चे अनुयायी भी हैं। वे गीता के सिद्धांतों को केवल पढ़ते ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन और चिकित्सा कार्य में आत्मसात भी करते हैं।


उनका जीवन यह संदेश देता है कि यदि हम अपने कार्य को कर्मयोग, निष्काम सेवा और समर्पण के भाव से करें, तो वह सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा बन जाता है।


वे आधुनिक समय के उन विरले डॉक्टरों में से हैं, जो विज्ञान और आध्यात्म का संतुलन बनाकर चलते हैं। उनकी चिकित्सा सेवा केवल हड्डियों को जोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे टूटे हुए विश्वास को भी जोड़ते हैं, दर्द को कम करते हैं और लोगों के जीवन में आशा का संचार करते हैं।


"डॉ. नीरज अग्रवाल केवल एक डॉक्टर नहीं, बल्कि एक सच्चे कर्मयोगी हैं, जो गीता के ज्ञान को अपनी चिकित्सा सेवा के माध्यम से जीवन में उतार रहे हैं।"